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Saturday, August 29, 2009

महापुरुषों की आलोचना और हम

आज सायंकाल मैं राजशेखर व्यास लिखित पुस्तक "सरहद पार सुभाष - क्या सच:क्या झूठ!"पढ़ रहा था। इस पुस्तक में भी नेताजी सुभाष चाँद बोस और पंडित नेहरू के रिश्तों पर चर्चा के दौरान कुछ पंक्तिया ऐसी मिली जिसमे महापुरुषों के सम्बन्ध में हमारी भारतीय मानसिकता का विश्लेषण किया गया। यह पंक्तिया वर्तमान सन्दर्भ में जिन्ना, पंडित नेहरू और सरदार पटेल के विभाजन सम्बन्धी विवाद में भी सटीक बैठती हैं। मैं समझता हूँ कि हम सभी को स्थापित मापदंडों से निकलकर राष्ट्र हित को ध्यान में रखकर विभाजन का विश्लेषण करना होगा। विभाजन एक सच्चाई हैं जिससे नकारा नहीं जा सकता किंतु उसके कारकों के अध्धयन से राष्ट्र को भविष्य के लिए यथोचित सीख मिलेगी। वर्तमान सन्दर्भ में "सरहद पार सुभाष - क्या सच:क्या झूठ!" से राजशेखर व्यास के निम्न विचार पढिये और बतायें कि क्या आप इसे सहमत हैं या नहीं...

"...प्रायः हम अपने महापुरुषों की पुण्य-तिथियों और जन्म-दिवसों पर उनकी गुण-गाथा और यश-गान ही गाया करतें हैं, उनकी आलोचना या कमजोरी को सच्चाई और ईमानदारी से कहने और सहने का नैतिक साहस भी हम में नहीं हैं । क्या हम यह समझते हैं की हमारे महापुरूष इतने कच्चे हैं कि वे आलोचनाओं से ढह जाएँगें? दुसरे उनकी आलोचनाओं को उनके प्रशंसक, अनुयायी अपनी व्यक्तिगत आलोचना मान लेते हैं तथा उसे अपने अहम् और सम्मान का प्रश्न बना लेते हैं। एक प्रवृति और दखी गई है, जब भी कोई आलोचक, विद्रोही, प्रचलित परम्परा, मान्यता, विश्वास और सिद्धांतों को तोड़ने का साहस या प्रयत्न करता है तो उसे भी घमंडी या अहंकारी समझा जाता है। प्रायः यह भी देखा गया है कि महापुरुषों के समर्थक इतने अंध श्रद्धावान या कट्टर होते हैं कि उनके खिलाफ सच्चाई का एक शब्द भी सुनना पसन्द नहीं करते। संभवतः वे यह समझते हैं कि अगर उनके प्रेरक का ही व्यक्तित्व ढह गया या स्वयं ही कमजोर, अक्षम या ग़लत साबित हो गया तो उनका स्वयं का अस्तित्व भी तब कहाँ जाएगा , और अपने अस्तित्व ढहने जी कल्पना मात्र से ही हम लोग इतने आतंकित रहते हैं कि सच्चाई कहने -सुनने का साहस भी खो बैठते हैं। "

Sunday, August 23, 2009

भाजपा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की विडम्बना ही हैं कि सारे के सारे मुख्या-धारा के राट्रीय राजनैतिक दल लोकतान्त्रिक दलगत ढांचे में विश्वास नहीं करते हैं। हमारी कांग्रेस जहाँ राजवंश मोह से च्युत नहीं हो पाती, वहीं बासपा बहन जी से बाहर नहीं सोच सकती हैं, कम्युनिस्ट पार्टियों में भी गिने चुने चेहरे ही हैं। भाजपा - "अ पार्टी विद डिफरेंस" से कम से कम ऐसी अपेक्षा थी कि वैचारिक स्वतंत्रता और उसकी अभिव्यक्ति को दलगत राजनीति की परिधियों से बाहर रखेगी । किंतु पिछले कुछ वषों में पार्टी सोच की एक पूर्व-निर्धारित लीक से हटकर नहीं सोच पा रही हैं। हिंदुत्व और राष्ट्रीयता के मुद्दों में अपनी स्थिति भी स्पष्ट रूप से नहीं रख पा रही हैं। जहाँ संघ से अपेक्षित रूप से जुडा रहकर कर अतिवादी हिन्दू विचारधारा का समर्थन भी करना चाहती हैं वहीं दूसरी ओर सर्व-लुभावन पार्टी भी दिखना चाहती हैं। इस प्रकार विचारधारा के दो छोरों के बीच दल की डावाडोल स्थिति ने दल के नेतृत्व से जुड़े लोगों के लिए भी असमंजस और दिशाहीनता ही प्रदान की है। एक लंबे अरसे से दल के ध्वजारोही रहे कल्याण,उमा भारती आदि इसी वैचरिक द्वंद के चलते पार्टी से बाहर निकाल दिए गए । ऐसा प्रतीत होता हैं कि दल की सोच के स्थापित मापदंडों से बाहर सोचना संघ और भाजपा के वर्तमान नेतृत्व के साह्य नहीं हैं।


इसी क्रम में नवीनतम कड़ी हैं जसवंत सिंह। उन्हें जिन्ना पर अपने विचारों को प्रकट किया नहीं कि जिस दल के वे संस्थापक सदस्यों में से थे उसी ने उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। दल ने पहले ही स्वयं को, उनके जिन्ना सम्बन्धी विचारों को उनके व्यतिगत विचार बता कर , उनके कथन से दूर कर लिए था। फ़िर दल के चिंतन बैठक के पूर्व बिना किसी चेतावनी के, बिना उनका पक्ष सुने निष्काषित करना मात्र तानाशाही का प्रतीक हैं। दलगत लोकतंत्र के मूक एवं निर्मम वध हैं। हाल में ही हुई चुनावों में दल की पराजय के वास्तविक कारकों के निर्धारण और विश्लेषण के स्थान पर ऐसा अनुचित कदम नहीं उठाते। जसवंत सिंह ने कई बार दल के लिए विषम स्थितियां खड़ी की हैं और संभवतः दल उनसे इसी कारण निजात पाना चाहता हो । उनके ऊपर भ्रष्टाचार, अफीम, चुनावी नोट-वोट कांड, पुत्र मोह और कंधार जैसे कई विवादस्पद आरोप रहे हैं। किंतु उसके बावजूद उनका इस प्रकार से दल-निष्कासन किसी भी प्रकार उचित नहीं हैं।

अडवाणी जी ने भी जिन्ना की मजार पर जाकर मत्था टेका ही था। संघ ने नाराजगी तो दिखाई थी पर आसानी से इस आधार पर क्षमादान भी दे दिया था कि वो अडवाणी जी का व्यक्तिगत मत हैं। अडवाणी जी ने भी जिन्ना के भाषणों और अन्य विचारों और पत्रों के आधार पर अपने व्यक्तव्य को सत्य स्थापित करने का प्रयास किया था। आज जब जसवंत सिंह ने भी वही बात की तो इतना शोर क्यों हैं? मुझे तो राम चरित मानस का वो प्रसंग याद आता हैं जब मंदोदरी और विभीषण दोनों ने ही राम को सीता ससम्मान लौटने का अनुरोध किया था। रावन ने जहाँ मंदोदरी को हंसकर गले लगा कर समझाया वहीं बिचारे विभीषण को भरी सभा में पदाघात और राज-निष्कासन का दंड मिला। ऐसा ही कुछ जसवंत के साथ भी हुआ। यूँ तो इन्टरनेट पर टाईम्स ऑफ़ इंडिया के सर्वे में अधिकांशतः लोगो ने भाजपा को आडवाणी और जसवंत के लिए दोहरे मापदंडो के लिए कठगरे में खड़ा किया हैं। किंतु इन सबसे इतर जिस प्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन हुआ हैं वो दुखद हैं। आज ही जसवंत सिंह ने अटल जी से मुलाकात की हैं और सुधीन्द्र कुलकर्णी के सैद्धांतिक कारणों से त्यागपत्र के बाद भाजपा में उत्पन्न होने वाली नवीन परिस्थितियाँ वास्तव में भारतीय राजनैतिक पटल पर महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

Wednesday, July 8, 2009

ज़रदारी की स्वीकारोक्ति: पाकिस्तान का भस्मासुर

आज 'टाइम ऑफ़ इंडिया' की वेबसाइट पर यह ख़बर ("Pak created and nurtured terrorists: Zardari") पढ़ते-पढ़ते मैं ठिठक गया। न तो इस ख़बर में कोई नई बात, न ही कुछ नवीन जानकारी। फ़िर भी जिस बात ने मुझे चौकाया वो थी पाक राष्ट्रपति के द्वारा स्वीकारोक्ति। उनके अनुसार क्षणिक लाभ के लिए किए गए पकिस्तान के इस प्रयास की विफलता....सर्वविदित हैं कि यह क्षणिक लाभ तो भारत के अहित के आलावा कुछ भी नहीं हैं...

पकिस्तान ने जो कट्टरपंथियों की जमात तैयार की हैं वो न तो पाकिस्तान कि ही सगी हैं न भारत की। एक पूरी पीढी के ज्ञान-चक्षु बंद करके हो नेत्रहीनों की तालिबानी सेना तैयार की हैं उनसे अब सही दिशा में जाने की उम्मीद भी बेकार हैं। जरदारी के शब्दों में - वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर की घटना से पूर्व यह वर्ग पाकिस्तानी समाज के सम्मानित नायक थे किंतु तत्पश्चात ये सिर्फ़ खलनायक रह गए...और आज का इनका बढ़ा हुआ स्वरुप पाकिस्तानी तंत्र की विफलता नहीं हैं क्योंकि उसीने तो वर्षों इस व्यवस्था को पला और पनपने दिया हैं.... हाय रे! भोलापन... सत्य से साक्षत्कार - भस्मासुर ने सर पर हाथ रखने की इच्छा प्रकट की तब ही पता चला हम ने क्या कर डाला...

काँटों के बेल को सालों पनपाया कि पडोसी के दरवाजे पर छोड़ आयेंगे आज घर के ही लोंगों को कांटे चुभ रहे हैं तब समझ में आया कि क्या कर डाला। कश्मीर की आजादी के नाम पार पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंस तक कितने मदरसे समाज-विरोधी विष उगल रहे हैं (देखें) , जिस प्रकार अभी भी प्रतिदिन सीमा पार घुसपेठ के प्रयास होते हैं, जिस प्रकार दाऊद को संरक्षण प्राप्त हैं उससे तो लगता नहीं कि पाक ने अभी भी कुछ सबक लिया हैं। फ़िर भी यदि इस स्वीकारोक्ति को एक अच्छी पहल माना जा सकता हैं (या अपरिपक्व राजनेता की निशानी - जो ज़रदारी के लिए उचित नहीं हैं)

Sunday, May 17, 2009

क्या सिक्किम में पुनः चुनाव होने चाहिए

अभी-अभी यह ख़बर पढ़ी कि सिक्किम डेमोक्रेटिक पार्टी [एसडीएफ] ने सिक्किम की सभी विधानसभा सीटों और एकमात्र लोकसभा सीट पर बहुमत हासिल कर लिया हैं। सम्पूर्ण सिक्किम में एक भी अन्य दल एक भी सीट न पा सका। सम्पूर्ण सिक्किम विधानसभा विपक्ष विहीन हैं।

लोकतंत्र को की जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन के रूप में परिभाषित किया जाता हैं उसमे जनता का हित का ध्यान रखने के लिए विपक्ष का बड़ा हाथ होता हैं। विपक्ष प्रजा के लिए एक परिक्षण और नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था के रूप में कार्यरत होता हैं जो यह निश्चित करता हैं की एक दल, एक विचारधारा और एक व्यक्ति तानाशाह का रूप न ले सके- समाज के हितार्थ निर्णय लेने के लिए और वैचारिक भिन्नता के चलते उस निर्णय के सभी पक्षों को जांचने के लिए विपक्ष का होना अत्यन्त आवश्यक हैं। लोकतंत्र में वैचारिक भिन्नता, क्षेत्रीय मुद्दों और नेताओं का ज़मीन से जुडा होना यह सुनिश्चित करता हैं की एक सदन में कम से कम दो पक्ष तो हो। किंतु गणितीय आधार पर केवल एक दल के सत्ता में आने की क्षीण संभावना तो रहती हैं किंतु हर लोकतंत्र में ऐसा कभी न होगा सोच कर एक दलीय सत्ता के विषय में, मेरे ज्ञान ,संविधान प्रदत कोई व्यवस्था नहीं हैं। इस बार सिक्किम में यह चमत्कार हो गया हैं और चामलिंग चौथी बार सरकार बनाने जा रहें हैं...

किंतु क्या एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष के आवश्यकता को ध्यान में रख कर क्या सिक्किम में पुनः चुनाव होने चाहिए (अथवा राष्ट्रपति शासन होना चाहिए ) या जनादेश का पालन करते हुए विपक्ष विहीन शासन होना चाहिए। इस व्यवस्था में संविधान क्या कहता हैं? आपके विचार और राय जानना चाहूँगा...साथ ही यदि कोई पाठक इस विषय पर संविधान प्रद्दत व्यवस्था के विषय में जानते हो तो बताएं।

Thursday, April 9, 2009

प्रधनमंत्री पद के लिए खुली बहस: किनती आवश्यक

अभी हाल में ही आडवाणी जी ने मनमोहन सिंह जी को टीवी पर खुली बहस के लिए चुनौती दी थी। वैसे तो इस बहस पर कांग्रेस की तरफ़ से आशानुरूप कोई जवाब नहीं आया। हाँ, दिग्विजय सिंह जी ने इसे सस्ती लोकप्रियता का टोटका करार दिया (देखें) और दूसरी ओर मल्लिका साराभाई ने आडवाणी जी को ही बहस की ललकार लगाई (देखें) ।

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, फ्रांस में राष्ट्रपति पद हेतु और कनाडा में प्रधानमंत्री पद हेतु इस तरह की बहस की प्रथा हैं। इस तरह की बहस जहाँ सभी प्रतिद्वंदियों को एक मंच पर एक-दुसरे सम्मुख लाकर आमने-सामने विचार रखने, तर्क-वितर्क करने का मौका प्रदान करतें हैं, वहीं जनता को भी अपने नेतृत्व को परखने का अवसर प्रदान करते हैं।

किसी भी लोकतंत्र में संवाद अत्यन्त आवश्यक हैं। यह संवाद विभिन्न दलों में (अंदरूनी एवं बाह्य), जनता और दलों के बीच निरवरोध चलाना चाहिए। शायद इसीलिए अधिकतर लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में निष्पक्ष व स्वतंत्र पत्रिकारिता और सूचना के अधिकार की सुविधा प्रदान की गई हैं - जिससे एक स्वस्थ संवाद मतदाताओं को उचित जानकारी देकर जागरूक नागरिक बना सकें। (यहाँ ये भी आवश्यक हैं कि इस प्रकार के संवाद अथवा जानकारी सुलभ और सस्ते साधनों से उपलब्ध हो।)

भारतीय लोकतंत्र जहाँ पर बहुदलीय प्रथा हैं और दल किसी रेडियोधर्मी पदार्थ की तरह नित्य ही विघटित होते रहते हो, वहां दलों के बीच का अन्तर समझ पाना अत्यन्त जटिल हो जाता हैं। एक ही विचारधारा से उत्पन्न दल पुर्णतः विपरीत चरित्र के साथ जनता के समक्ष उतरते हैं , जैसे लोहियावादी समाजवाद से उत्पन्न मुलायम की सपा और लालू की राजद...कांग्रेस ने ही ऐसे नेताओ की फौज तैयार की हैं जो कांग्रसी-जन्म कर कांग्रेस-विरोधी हो गए और एक नए दल की प्रणेता बन गए हैं, ऐसे ही भाजपा से जन्म लेकर कितने ही राष्ट्रवादी/हिंदूवादी दल रक्तबीज की तरह उपजे हैं कहना मुश्किल हैं...व्यक्तिगत स्वार्थ, अपने अहम् , अपनी उपेक्षा और वैचारिक मतभेदों से बहुदलीय व्यवस्था में ऐसे दलों का जन्म भी अपेक्षित हैं किंतु भारत की विविधता से उत्पन्न प्रांतवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद और जातिवाद इस समस्या को और सघन कर देते हैं।

दलों के बीच अन्तर करने के लिए उनके चुनाव घोषणा-पत्र के अतिरिक्त कोई संसाधन नहीं होता। भारत में अधिकांश मतदाता अपने पहले से ही तय मापदंडो के कारण इन घोषणापत्रों का संज्ञान भी नहीं लेते, यह मापदंड कुछ भी हो सकते हैं - जातिगत समीकरण, नेतृत्व में अंध-आस्था (न की दल और विचारधारा में), राजनैतिक और तत्कालीन मुद्दों से उदासीनता और मुख्य रूप से अनपढ़ मतदाता। ऐसे में, सभी दल उन्मुक्त रूप से रैलियों, चुनाव-सभाओं और यात्राओं में समर्थकों के श्रवण-सुख के आधार पर मन-लुहावन भाषण देते रहते - चाहे ये भाषण, वादे विरोधाभाषी ही क्यों न हो। चुनाव के दौरान आग भड़काऊ विषय जोकि दल की विचारधारा से विमुख हो क्यों न हो उपयोग किए जातें हैं।

इन परिस्थितियों में टीवी पर खुली बहस से न केवल मतदाताओं को अपने नेताओ के मुद्दे-दर-मुद्दे विचार और प्रस्तावित नीतियों का ज्ञान प्राप्त होगा बल्कि साथ ही प्रतिद्वंदी नेतृत्व के विचार भी जानने को मिलेंगे। यह भी पता चलेगा की क्या वे नीतिगत अन्तर हैं जो एक दल को दुसरे से, एक नेता को दुसरे से इतर करते हैं। मुझे विश्वास हैं की कई विषयों पर भाजपा और कांग्रेस शायद एक से दिखे और कई मुद्दों पर नेता अपने मतदाताओं के पूर्वाग्रहों से हटकर खड़े मिलेंगे। इस तरह की बहस में भाजपा और कांग्रेस ही नहीं जो भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो को आना चाहिए और आतंरिक विषयों से लेकर अन्तराष्ट्रीय संबंधों तक पर चर्चा होनी चाहिए...

देखने-सुनने का प्रभाव भी केवल पठान के प्रभाव से ज्यादा होता हैं... साथ ही टीवी पर खुली बहस सारे राष्ट्र को व्यापक रूप से, सबसे अल्प मूल्य पर सामान संदेश प्रेषित करेगी।

Saturday, April 4, 2009

मत क्रय : लोकतंत्र की एक और पराजय

लोकतंत्र की अपनी श्रेष्ठताओं के बीच कई त्रुटियां भी हैं। जैसेकि संख्या-बल की महत्ता अक्सर ही नैतिक आदर्शों को हाशिये पर धकेल देती हैं। संख्या-बल के ही कारण भारतीय लोकतंत्र जातिवाद, प्रांतवाद, भाषावाद और (धार्मिक) आस्थावाद के अवसादों से ग्रस्त हैं। इसी संख्या-बल पर अधिपत्य जमाने के लिए राजनीति का न केवल अपराधीकरण हुआ बल्कि उसका व्यवसायी-करण भी हुआ हैं। जाति के समीकरण बैठते हुए अक्सर बाहुबलियों और मफिआओं अथवा धनाढ्यों को चुनाव-क्षेत्र से प्रतिनिधित्व मिल जाता हैं। इस सच को लगभग १४ लोकसभाओं तक हम भुगतते भी रहे। किंतु १५ लोकसभा के चयन की प्रक्रिया के शुरुआत के साथ ही लगभग तीन ऐसी घटनाएँ सामने आई जो हमारी चयन प्रक्रिया के बाजारू रूप को उजागर करती हैं। हमारी अधोपतन की ओर अग्रसर नैतिकता भी परिलक्षित होती हैं। यह घटनाएँ हैं - नेताजी (मुलायम), गोविंदा और अंत में जसवंत सिंह द्वारा खुलेआम धन वितरण की।

ऐसे तो भारतीय चुनावों में धन वितरण की घटना कुछ नवीन नहीं हैं। और शायद हमारी संवेदनशीलता भी इतनी कम ही गई हैं कि हम में से अधिकांश लोगों ने इन्हे आम घटना मान कर अनदेखा भी कर दिया हो। सम्भवतः दो कारणों से यह महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं:
१> मीडिया के विस्तार के कारण इन घटनाओ का प्रभाव वैश्विक होता हैं और यह भारतीय लोकतंत्र की छवि को धूमिल करतें हैं। पहले ऐसे घपले केवल चुनाव क्षेत्र और आयोग के बीच रह जाते थे आज यह वैश्विक रूप से बहस के मुद्दे हो जाते हैं ( यह अन्य राष्ट्रों के लिए भी सत्य हैं - जैसा ओबामा की रिक्त सीट को लेकर अमेरिका में हुआ)
२> सेण्टर फॉर मीडिया स्टडीज के हाल में किए सर्वेक्षण में लगभग सारे भारत में यह मत क्रय के चलन की स्वीकारोक्ति उभर कर आई। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू जैसे शिक्षित राज्य इस सूची में सबसे ऊपर हैं। शहरी क्षेत्र ग्रामीण इलाकों से ऊपर हैं।

मुलायम और गोविंदा जी ने तो होली के उपहार कह कर उस धन के वितरण के आरोप से पिंड छुडा लिया जबकि जसवंत जी ने परोपकार और दयालुता का आसरा लिया। इस चुनावी माहौल में और संदिग्ध परिस्थितिओ में दिए गए उपहारों को हमारा निष्पक्षीय चुनाव आयोग अपने राजनैतिक चश्मे से कैसे देखेगा यह तो जग जाहिर हैं...हाल ही में एक बाहुबली के चुनावी अभियान से लौटे मित्र ने बताया की वहां भी शक्ति और धन का खुलम-खुल्ला प्रयोग हो रहा हैं... दैनिक मजदूरों को यह कह कर धन दिया जाता हैं की मताधिकार का प्रयोग अवश्य करो और यह लो पैसा चुनाव वाले दिन मत देने आने के कारण होने वाले नुक्सान की भरपाई के लिए ...

यह चलन तो भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं। और प्रबुद्ध नागरिकों के लिए भी ... यदि यह चिंतनशील नागरिक अपने सुविधाग्रस्त जीवन से निकल कर मत प्रयोग के लिए नहीं जायेंगे तो संख्याबल हासिल करने के लिए जाति, धरम और भाषा के अतिरिक्त शक्ति और धन का नंगा खेल यूं ही अनवरत चलता रहेगा....

Tuesday, March 31, 2009

अपरिपक्वता की सज़ा...

वरुण गाँधी पर रासुका? भारत के चुनावी माहौल में जहाँ वोटों के लिए क्या-क्या नहीं होता ...बाहुबली और माफिया बन्धुओ से भरी संसद में जहाँ आचार संघिता की बात भी मजाक लगती हो, जहाँ चुनाव के दौरान अथवा अन्यत्र भी भारत, भारत के सविधान को राजनैतिक लाभ हेतु नेता गरियाते मिल जायेंगे, जहाँ भारत माँ को गली देकर लोग संसद में जाने का मार्ग प्रशस्त करते हो, जहाँ कम्युनिस्ट चीन से सहानभूति संसद के दरवाजे की चाभी हो । ऐसे देश में धर्म और जाति ही चुनावी गणित तय करती हो -आग उगलना चुनाव का हथियार होता हैं। लेकिन यह एक मर्यादा के तहत ही होना चाहिए।

वरुण ने जो किया वो उचित नहीं था। उसकी भात्सना भी की जानी चाहिए । मैंने अपने पिछले चिठ्ठे में लिखा भी था की वरुण के सपनो के भारत की कल्पना भी पाप हैं। पर वरुण के भाषण उनकी राजनैतिक अपरिपक्वता के साक्ष्य हैं। युवा जोश और वैचारिक दिशाहीनता ही ज्यादा उजागर करतें हैं उनके भाषण...उनके उद्दंड शब्दों के लिए उनकी जेल-यात्रा और चुनाव-आयोग की जांच ही पर्याप्त थी। मैं नहीं समझता था कि पीलीभीत की जनता इतनी रक्त-पिपासु हैं कि जरा से भड़काऊ भाषणों से दंगे कर बैठेगी... वो भी हिंदू जन-मानस...कम से कम राष्ट्र को गृह-युद्ध तक तो नहीं ले जा रहे थे उनके भाषण...(जब हमारे देश में भारत माँ को कुतिया कहने और वंदे मातरम के समर्थन में लोगों का स्वाभिमान नहीं जगता तो ये तो अत्यन्त ही तुच्छ बात थी)। ऐसे में वरुण पर रासुका लगना भी सर्वथा अनुचित हैं... वो भी बहनजी के हाथो जिनके मनुवादी विरोधी भाषण ज्यादा घातक होते थे ....

वरुण पर रासुका केवल राजनैतिक हथियार एवं वोट एकत्रिक करने की कोशिश ज्यादा लगती हैं। वरुण के भाषणों की ही तरह उन पर लगी रासुका की घटना भी निंदनीय हैं और भारतीय लोकतंत्र का मखौल उड़ती हैं...

Sunday, March 29, 2009

यह तो मेरे ख्याबों का भारत नहीं...

भारतीय लोकतंत्र का महासमर शुरू हो चुका हैं। जिस प्रकार होलिका दहन के पश्चात् होली शुरू हो जाती हैं उसी प्रकार चुनाव आयोग की घोषणा के बाद भारतीय लोकतंत्र में कीचड़ उछाल होली शुरू हो चुकी हैं... परन्तु भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार करने के लिए वरुण गाँधी ने जो बयान दिया हैं उसने तो मेरे ह्रदय को ही उदिग्न कर दिया हैं...लखनऊ की सरज़मीन पर गंगा जमुनी तहजीब के बीच अपना शैशव का उदभव और यौवन की तरुणाई देखने वाले इस ह्रदय को एक आघात सा लगा। बरेली में माँ चुन्ना मियाँ के मन्दिर जाती थी (जोकि लक्ष्मी नारायण के मन्दिर के नाम से भी जाना जाता हैं) उस मन्दिर का निर्माण एक मुस्लिम ने कराया था...

गाँधी के परिवारवाद से त्रस्त कांग्रेस ने मुझे कभी भी नहीं लुभाया (मेरे पिताजी एवं दादाजी के विचार मुझसे इतर हैं) जातिवाद के घृणित अवसाद से पीड़ित नेताजी और बहनजी का समाजवाद भी मुझे कभी आकर्षक नहीं लगा। इस कारण मेरे जैसे कई राष्ट्रवादियों के लिए भाजपा के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं हैं । जब वरुण गाँधी और मेनका ने भाजपा का दमन पकड़ा तो थोड़ा अटपटा तो लगा पर मन के किसी कोने ने उसका स्वागत भी किया। वरुण मुझे कतिपय युयुत्सु की तरह लगे जो परिवारवाद के मोह से ग्रस्त कौरवों को छोड़ कर पांडवों से आ मिले हो। पर अभी हाल में वरुण के दिए व्यक्तवों को देखा और सुना (http://www.in.com/videos/watchvideo-varun-gandhis-antimuslim-speech-2644997.html) तो मन त्राहिमाम्, त्राहिमाम् कर उठा। राजनैतिक लाभ हेतु दाल में नमक जितनी बयानबाजी को तो सैदव से ही देखते आए इस मन को सहसा विश्वास ही नहीं हुआ की कोई नेता ऐसा कर सकता हैं। इस चुनावी माहौल का ये तीसरा झटका कुछ ज्यादा ही ज़ोर से लगा (बहनजी का मनुवादी प्रेम और नेताजी का कल्याण प्रेम इस चुनाव के पहले दो झटके थे)। उनके इस व्यक्तव से मुझे संजय गाँधी याद आ गए। कहते भी हैं "माई गुन बछ्डू, पिता गुन घोड़। नाही ज्यादा ता थोड़े-थोड"....

वरुण के इस बयान की जितनी भी आलोचना की जाए कम हैं। परदेश में लाखों मील की दूरी पर बैठे इस मन में ऐसे भारत की तस्वीर तो नहीं हैं। एक सशक्त शक्तिशाली गौरान्वित भारत की छवि के स्वप्न से साथ जीते इस अप्रवासी मन में वरुण के भारत की कामना भी पाप हैं।

अधीर,
अप्रवासी

Sunday, March 8, 2009

नेताओ को परखने की कसौटी

मैंने Lee Iacocca (ली आईकोक्का) की लिखित पुस्तक "वेयर हव आल द लीडर्स ग़ौन?" (Where have all the Leaders Gone?) अभी हाल में ही पढ़ी। यह ली आईकोक्का ही वह महाशय हैं जिन्होंने डूबने की कगार पर बैठी क्र्य्स्लेर (Chrysler) कंपनी को सन् १९८० में न केवल उबारा था बल्कि उसको नियमित घाटे वाली स्थिति से निकाल कर एक लाभ अर्जित करने वाली संस्था में परिवर्तित कर दिया था। वाहन निर्माण में वैसे भी वो फोर्ड (Ford) की भी कई सफल कारों के भी जन्मदाता रहें हैं जिसमे फोर्ड मुस्टेंग, फिएस्टा , मरकरी कूगर इत्यादी प्रमुख हैं। ली ने ही मिनी-वैन का खाका तैयार किया था ।
अपनी इस पुस्तक में (जोकि २००७ में प्रकाशित हुई थी) ली ने अमेरिका में उस समय होने वाले चुनाव हेतु राजनैतिक माहौल और नेतृत्व की समीक्षा की थी। पूरी पुस्तक में उठाये गए प्रश्न, दिशाहीन नेतृत्व, जन मानस का असमंजस्य और वोट देने या ने देने की दुविधा जितनी अमेरिकी परिवेश में सटीक थे वे उतने ही अपने भारतीय परिवेश में भी। उसी समीक्षा में उन्होंने नेताओ को परखने की कसौटी के तौर पर एक मापदंड दिया हैं जिसे उन्होंने ९-सी (9-C) का नाम दिया हैं। यह ९-सी हैं-

  1. करिओसिटी (जिज्ञासा): सभी नेताओ को अपने अहम् से इतर सभी पहलुओ को जानने और समझने की चाहत होनी चाहिए। किसी नवइन विचार और संभावना को तलाशने की जिज्ञासा ।
  2. Creativity (सृजनात्मकता): वह नेता मिली हुई जानकारी और संसाधनों को प्रयोग कैसे कर पायेगा। क्या वह लंबे समय से चली आ रही परिपाटी से अलग कुछ करने की हिम्मत रखता हैं। क्या वो अपने विचारो को एक सिमित दायरों से बाहर लाकर कुछ कर गुजरने की संभवाना रखता हैं।
  3. Communication (वार्तालाप): किसी भी सफल नेता की लिए यह ज़रूरी हैं की वो जन-मानस से कितनी सहजता से बात करता हैं। केवल उनसे नहीं जो चाटुकारिता में रत हो बल्कि उनसे भी को प्रखर विरोधी हो... सच को व्यक्त करने से नहीं चुके ...
  4. Character (चरित्र): वैसे तो भारतीय परिवेश में यह एक दुर्लभ (संभवतः विलुप्त भी) गुण हैं। फिर भी यह जानना अत्यन्त आवश्यक की शक्ति भोग के साथ भी वो अपने चरित्र को सम्हाल पायेगा या फिट भ्रष्ट हो जाएगा (तबादले, पार्टी फंड चंदा, जन्मदिन के उपहारों आदि का अमेरिका में प्रचलन नहीं हैं वरना ली इन सबको तो इस मापदंड के दायेरे से बाहर कर देते)
  5. Courage (पौरुष): किसी भी विषम स्थिति से निपटने के लिए कितनी दृढ़-शक्ति हैं...हर चुनौती को समझने और ललकारने की कितनी हिम्मत हैं...क्या केवल कागजी-शाब्दिक शेर हैं या शिकारी भी हैं।
  6. Conviction (विचारधारा): हमारे नेताओ की किन मूल्यों और सिद्धांतो में आस्था रखते हैं। उनकी विचारधारा राष्ट्र-हित को सर्वोपरि रखती हैं या नहीं...
  7. Charisma (आकर्षण): लोगो के हुजूम में वो अलग नज़र आता हैं या नहीं...लोग उसके व्यक्तिव से रीझते हैं या नहीं॥एक सफल नेता की लोगो का विश्वास प्राप्त करने और एक भीड़ खीचने की शक्ति लोकतंत्र में ब्रम्हास्त्र से कम नहीं हैं ।
  8. Competence (सक्षमता/योग्यता): लोकतंत्र में नेतृत्व किसी तलवार कि धार पर चलने से कम नहीं हैं। नेताओ को अपने को परिणाम-उन्मुख सिद्ध करना ही पड़ेगा। एक राष्ट्र जहाँ वैचारिक साम्यता असंभव हो में जबतक नेता अपनी कुशलता, योग्यता और सक्षमता से किसी भी परियोजना/कार्यक्रम में परिणाम देकर स्वं को सिद्ध न करे तब तक उसका नेतृत्व संशय के दायरे से बाहर नहीं होता।
  9. Common Sense(सामान्य ज्ञान): सबसे साधारण गुण जोकि आसाधारण परिणाम देता हैं और अक्सर चरित्र कि तरह ही दुर्लभ होता हैं।

हमको भी इसी तरह कुछ मापदंड बनाकर अपने नेताओ को चुनना चाहिए। लोकसभा के चुनावों की घोषणा हो चुकी हैं इसलिए ऐसे मापदंड बहुत ज़रूरी हो जाते हैं। आपको क्या लगता हैं क्या यह ९ मापदंड भारतीय परिवेश में भी उपयुक्त बैठेगे कि नहीं? या इनमे कुछ फेर-बदल होनी चाहिए।

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