Wednesday, July 8, 2009

ज़रदारी की स्वीकारोक्ति: पाकिस्तान का भस्मासुर

आज 'टाइम ऑफ़ इंडिया' की वेबसाइट पर यह ख़बर ("Pak created and nurtured terrorists: Zardari") पढ़ते-पढ़ते मैं ठिठक गया। न तो इस ख़बर में कोई नई बात, न ही कुछ नवीन जानकारी। फ़िर भी जिस बात ने मुझे चौकाया वो थी पाक राष्ट्रपति के द्वारा स्वीकारोक्ति। उनके अनुसार क्षणिक लाभ के लिए किए गए पकिस्तान के इस प्रयास की विफलता....सर्वविदित हैं कि यह क्षणिक लाभ तो भारत के अहित के आलावा कुछ भी नहीं हैं...

पकिस्तान ने जो कट्टरपंथियों की जमात तैयार की हैं वो न तो पाकिस्तान कि ही सगी हैं न भारत की। एक पूरी पीढी के ज्ञान-चक्षु बंद करके हो नेत्रहीनों की तालिबानी सेना तैयार की हैं उनसे अब सही दिशा में जाने की उम्मीद भी बेकार हैं। जरदारी के शब्दों में - वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर की घटना से पूर्व यह वर्ग पाकिस्तानी समाज के सम्मानित नायक थे किंतु तत्पश्चात ये सिर्फ़ खलनायक रह गए...और आज का इनका बढ़ा हुआ स्वरुप पाकिस्तानी तंत्र की विफलता नहीं हैं क्योंकि उसीने तो वर्षों इस व्यवस्था को पला और पनपने दिया हैं.... हाय रे! भोलापन... सत्य से साक्षत्कार - भस्मासुर ने सर पर हाथ रखने की इच्छा प्रकट की तब ही पता चला हम ने क्या कर डाला...

काँटों के बेल को सालों पनपाया कि पडोसी के दरवाजे पर छोड़ आयेंगे आज घर के ही लोंगों को कांटे चुभ रहे हैं तब समझ में आया कि क्या कर डाला। कश्मीर की आजादी के नाम पार पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंस तक कितने मदरसे समाज-विरोधी विष उगल रहे हैं (देखें) , जिस प्रकार अभी भी प्रतिदिन सीमा पार घुसपेठ के प्रयास होते हैं, जिस प्रकार दाऊद को संरक्षण प्राप्त हैं उससे तो लगता नहीं कि पाक ने अभी भी कुछ सबक लिया हैं। फ़िर भी यदि इस स्वीकारोक्ति को एक अच्छी पहल माना जा सकता हैं (या अपरिपक्व राजनेता की निशानी - जो ज़रदारी के लिए उचित नहीं हैं)

3 comments:

बालसुब्रमण्यम said...

पाकिस्तान भारत के लिए गले में फंसी हड्डी के समान है, न उसे उगलते बनता है, न निगलते। इस तरह के नाटक वह पिछले 60 साल से करता आ रहा है। पाकिस्तान पर अमरीकी दबाव है कि भारत के साथ संबंध सुधारो। उसे अमरीका से खूब सारी धनराशि भी मिल रही है। इसलिए पाकिस्तान के लिए यह दिखाना जरूरी है कि वह अपनी गलती महसूस कर रहा है, उसे पछतावा हो रहा है, वह सुधरना चाह रहा है। शिमला समझौते के समय जुलफिकर भुट्टो ने भी इंदिरा गांधी के सामने ऐसे ही आठ-आठ आंसू रोए थे, पर उसका क्या हुआ?

इसलिए इन नेताओं की नौटंकियों को गंभरीता से न लेकर, हमें पाकिस्तान के उन वर्गों के साथ सीधा संपर्क स्थापित करना चाहिए जो धार्मिक कट्टरपन से तंग आ चुके हैं और भारत की तरह लोकतंत्र की खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं।

इन वर्गों में वहां के उद्योगपति, कलाकार, मध्यम वर्ग, छोटे-बड़े दुकानदार, मजदूर, किसान, गरीब आदि हैं, जिन सबको भारत के साथ बढ़े हुए व्यापारिक संबंधों से सीधा फायदा हो सकता है।

जब इन वर्गों का भारत में गहरा हित बन जाएगा, वे पाकिस्तान की राजनीति को भी भारत के पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश करेंगे।

जरदारी, पाक सेना आदि से बात करने से तो उनके हाथ और मजबूत ही होंगे। ये पूर्णरूप से भारत विरोधी हैं।

Sudhir (सुधीर) said...

बालसुब्रमण्यम जी आप की बात से पूर्ण सहमति, हमे नेताओं और सचिवों से इतर जन साधारण से रिश्ते बढ़ने चाहिए। मेरे यहाँ पर कई पाकिस्तानी मित्र भी हैं। वे सभी ऐसी ही सोच रखते हैं...

Rahul said...

ab hamarey priya pradhan mantri ji ne bhi sweekar liya hai ki balochistan mein bharat ka haath hai. in dono khabron se saaf zaahir hai ki sab statements US ki zor dene ka natiza hai. dono mulkon ne apna daam laga ke bech diya hai US govt. ko. bharat mata ka stock aajkal acha perform kar raha hai, mehnati IT coolies ki badaulat. zardari aur sonia ke bank a/c to increase ho rahe hain, par paisa to US taxpayers ko hi dena hai.. :)

Related Posts with Thumbnails