Sunday, October 4, 2009

क्या हमने गाँधीवादी तरीकों का दुरूपयोग किया हैं?


इस माह के प्रारंभ के साथ ही सारा राष्ट्र गाँधीमय हो जाता है...अब तो बापू के जन्मतिथि को वैश्विक स्तर पर "अहिंसा दिवस" घोषित करके संयुक्त राष्ट्र ने भी गाँधी-सिद्धांतों का अनुमोदन कर दिया है. और रही सही कसर इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति श्री ओबामा जी ने अमेरिकी सामाजिक  परिवर्तन की सोच की जंडे गाँधी  के विचारों से बताकर अपनी सच्ची स्वीकारोक्ति से इस अनुमोदन को बढावा ही दिया. इसमें कोई शक नहीं हैं कि गाँधी जी ने अपने साधारण तरीकों और असाधारण इच्छाशक्ति से इस देश और विश्व की विचारधारा को बदल दिया है...यह वैचारिक परिवर्तन इस देश को किस दिशा में ले गया इस पर मतभेद हो सकते हैं किन्तु इन परिवर्तनों ने इस राष्ट्र की आत्मा तक को प्रभावित किया इसमें कोई शक नहीं है. यदि अहिंसा के प्रवर्तक रहे हमारे आदि ऋषियों से लेकर, बुद्ध और महावीर के ज्ञान को वैश्विक स्तर पर किसी ने प्रचारित  किया  हैं - ऐसे  लोगों की सूची में गाँधी जी सर्वोपरि होंगे इसमें कोई संदेह नहीं है. गाँधी जी  ने अहिंसा को  एक वैचरिक सिद्धांत से अस्त्र के रूप में परिवर्तित करा था. और साथ ही सत्याग्रह, अनशन, असहयोग और हड़ताल जैसे  यंत्रों को  जन्म  दिया  था.

हमारे  देश  में जहाँ विचारधारा के ऊपर व्यक्तिगत छवि सदैव अधिक हावी रहती है.  (चाहे स्वतंत्रता पूर्व की कांग्रेस हो या वर्तमान के राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल इस सत्य को हर कहीं देखा जा सकता है.)   गाँधी वादी विचारधरा  के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ....सिद्धांतो के  ऊपर गाँधी जी हावी हो गए....पैसे से लेकर नेतागिरी की पोशाकों तक, पार्कों से लेकर राज्यमार्गों तक, संसद की दीवारों से लेकर जन रैलियों के भाषण तक सब कुछ गांधीमय हो गया . नेताओं  ने गाँधी के समान खादी धारण कर के ग्राम-स्वराज्य को भूला दिया, गाँधी के चेहरों वाले मुद्रा (नोटों ) के भाव बढ़ाने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वागत कर ग्रामीण उत्थान को अनदेखा कर दिया...गाँधी के सत्यवादी रूप की ठेकेदारी लेने वालों की चुनावी योग्यता उनके अपराधिक मामले तय करने लगे...जन-लोकतंत्र की भाषणों में दुहाई देने वालों को उनकी बाहुबली और मत लूटने या क्रय शक्ति के आधार पर ढूँढा जाने लगा, सर्व-कल्याण और हरिजन उत्थान के विषय में सोचने  के लिए नेता उनकी जातीय गणित के आधार पर तय होने लगे...हमारे देश में गाँधी तो रहे पर एक मुखौटे की तरह. उनकी आत्मा और उनके सिद्धांत तो, गोडसे की गोली से पहले, भारतीय राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा की बलि चढ़ गए.....

अपने व्यतिगत क्षोभ  को मैं और भी अधिक बढा हुआ पता हूँ जब मैं गाँधीवादी हथियारों जैसे हड़ताल, अनशन, असहयोग का सार्वजानिक दुरूपयोग देखता हूँ...किसी भी सरकारी महकमों में यूनियन (चाहे मजदूर यूनियन हो या अधिकारीयों की संस्था) अपनी बातें जबरन मनवाने के लिए इनका गलत इस्तेमाल करते हुए मिल जायेंगे...अभी हाल में पायलट ने सामूहिक छुट्टी लेकर अपने असहयोग अभियान  से एक विमान कंपनी को पंगु बना दिया था... कभी-कभी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल/अनशन , नर्सों की  हड़ताल, वार्ड-बोयस की अप्रत्याशित   हड़ताल पूरे  के  पूरे शहर को पंगु कर देती है...लोग अब बदली हुई परिस्थिति को समझना ही नहीं चाहते...गाँधी जी ने जब इन हथियारों का प्रयोग किया था तब भी जन कल्याण के भाव को कभी नाकारा नहीं था...(वो तो चौरी-चौरा कांड में भी शत्रु के अहित से भी दुखी हुए थे). उस समय देश में के शत्रु सरकार थी तो यह हथियार उस व्यवस्था  को पंगु  बनाने के लिए  प्रयुक्त हुए  थे  किन्तु वर्तमान में जन-कल्याण को नज़र-अंदाज़ करके  अपनी ही सरकार को पंगु बनाना कहाँ तक उचित हैं यह प्रश्न सभी को हड़ताल से पूर्व स्वयं से करना चाहिए . इस विषय  में इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि हमारे  सर्वोच्च न्यायालय ने अभी हाल में ही  एक विश्वविद्यालय की छात्रा  को फटकार  लगाई थी कि तुम गाँधी नहीं हो और गाँधीवादी तरीकों का प्रयोग विद्यालय और शिक्षा व्यवस्था को  पंगु  बनाने के लिए नहीं कर सकते. सोचने की बात  है कि हमारे राष्ट्र की सर्वोच्च न्यायिक संस्था को ऐसा क्यों कहना पड़ा? मेरी  समझ में तो दो ही विकल्प आते हैं-

  1.  वर्तमान में गाँधीवादी तरीकों ने अपनी प्रासंगिता खो दी है.


  2. हमने गाँधीवादी तरीकों का इतना दुरूपयोग कर लिया हैं कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था भी कहती हैं - "बस बहुत हुआ"

गाँधीवादी सिद्धांत तो गाँधी से जन्मे नहीं हैं...वो तो युगों से हमारी परंपरा में विद्यमान हैं...अहिंसा महावीर और बुद्ध के मनन और वाल्मीकि की करुणा में बहती एक अविरल धारा के रूप में हमारी संस्कृति का अविभाज्य अंग रही हैं. गाँधी तो चन्द्र के समान उस ज्ञान की रोशनी में बस चमक गए (सारे चकोर चन्द्र पर मोहित हैं...सूर्य को कोई पूछता भी नहीं :) ) . अतः अहिंसा  एक शाश्वत सत्य की तरह अपनी प्रासंगिता नहीं खो सकती है  (हाँ! स्थान और काल के आधार पर उसकी उचित व्याख्या करनी होगी). मुझे तो केवल  दूसरा कारण ही नज़र आता हैं और उसका मूल हमारी व्यतिगत छवि को सिद्धांतों से ऊपर रखने की आदत हैं....क्योंकि हम गाँधी के विचारों और सिद्धांतों को नहीं गाँधी को जीवित रखने के प्रयासों में जुटे हैं इसीलिए हम गाँधीवादी तरीकों के  दुरूपयोग को बढ़ावा दिए जा रहे हैं....

और हम भूलते हैं कि गाँधी को जिन्दा रखने के इस जूनून में हम हर पल, हर क्षण उन्हें मारते जा रहे हैं....

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

गांधीवादी तरीकों का दुरूपयोग ही नही,
अपमान भी हो रहा है!

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