Monday, February 1, 2010

बोले तो...आज अपुन का डबल हैप्पी बर्डडे है

एक लम्बे अंतराल के बाद लिखने बैठा हूँ... आज एक वर्ष पूर्व १ फरवरी के ही दिन से अपनी व्यक्तिगत ३६वीं सूर्य परिक्रमा के प्रारंभ के साथ मैंने चिठ्ठाकारिता की शुरुआत की भी थी. आज जब चिठ्ठा-जगत में लिखते-पढ़ते (लिखते कम, पढ़ते ज्यादा) भूमिरथ पर बैठकर कर सूर्यदेव की यह परिक्रमा पूर्ण हो रही  हैं...तो अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि यूनानी देव जानौस (JANUS) की तरह आगे और पीछे दोनों देखा जाये....कहते हैं न वही वर्तमान का बोध सार्थकता प्रदान करता हैं जो इतिहास से सीखे और भविष्य के लिए आशावान हो....

वैसे भी हम भारतियों को इतिहास में जीने और भविष्य के सपने देखने ही अच्छे लगते है...यदि "रंग दे बसंती" के  डीजे के शब्दों को उधार लूं तो "एक टांग इतिहास में और एक टांग भविष्य में है इसीलिए तो हम ...."  खैर, जाने दीजिये हम ऐसे वैसे शब्दों का इस्तेमाल करके अपनी साहित्यकार वाली उम्मीद क्यों छोड़े, अब हर कोई तो "रियलिस्टिक लिटरेचर" से सफलता पूर्वक साहित्यकार तो नहीं बन सकता. वो अलग बात हैं कि कुछ नुक्कड़ नाटक पढ़कर/मंचन कर हमने भी कभी रियलिस्टिक साहित्यकार बनने की संभावना तलाशी थी.  वैसे हमारे भी चिठ्ठाकारी के बचपने में (वैसे अभी भी कौन से प्रौढ़ हो गए) चिठ्ठाकारिता में साहित्य की गंभीरता और लेखन के लिए बहस चल निकाली थी. भारतीय संसद में महिला आरक्षण की तरह वह बहस अभी भी जारी है...हम तो मन की कहने निकले थे पर जब देखा कि "भईया इ साहित्यकारों वाली लाइन लग रही है तो हमहू लग गए...." आज नहीं तो कल जब कहीं चिठ्ठाकारों को साहित्यकारों का दर्जा मिला तो हम भी प्रथम श्रेणी के नहीं तो जनरल क्लास वाले साहित्यकार तो गिन ही लिए जायेंगे...जैसे कि प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय तक  सभी मास्टर सा'ब शिक्षाविद हो जाते हैं...

एक और बात तो हमे चिठ्ठाकारी करते करते पता चली वो थी - हमारे लोकतंत्र की तरह इस सार्वभौमिक मंच में भी बिना बहस कोई मुद्दा  ही नहीं चल सकता...गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के समान यह सच तो पहले से विद्यमान है किन्तु अब हम लिख दिए हैं तो शायद न्यूटन की तरह हम भी महान हो जाए...बस यूरेका यूरेका कह कर दौड़ना बाकी है...हमारी संस्कृति में बहस का विशेष स्थान है...जन-मन में बहस यूँ हावी है कि नुक्कड़ के चाय के दुकान से लाकर काफी-हाउस तक की संस्कृति में ज्ञानवान  सिद्ध होने के लिए बहस करनी पड़ती है. और तो और कई बार ट्रेन के डिब्बे से लाकर साँझ की चौपाल तक लोग ज्ञानी-श्रेष्ठ की उपाधि हेतु बहस कर जाते है...चाहे मुद्दों में उनकी आस्था हो न हो, हाँ विषय को अपने दर्पण से निहार कर अपनी परिभाषा के साथ लोग आंकड़ों के साथ यूँ बहस करते है कि लगता है ब्रिटैनिका के संपादक मंडल में स्थान पाने का साक्षात्कार दे रहे हों. (हमने तो कई ज्ञानियों को एक बहस से दूसरी बहस में अपनी ही बात का विरोध करते हुए पाया है..खैर यह हम अल्प-बुद्धि तो अधिकतर मौन ही रह जातें हैं....)कई बार तो चिठ्ठाकारिता के  मंच पर नर-नारी, साहित्यासहित्य, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, आस्था और वैज्ञानिकता जैसे मुद्दों पर ऐसे बहस होती  है कि लगता है अगले कल्प में देवासुर संग्राम से पहले हमारे चिठ्ठाजगत से कुछ कैंसलटेंट तो माँगा ही लिए जायेंगे.  मुद्दों को बहस से सुलझाने की हमारी प्रक्रिया में आस्था (और स्वयं को ज्ञानत्व प्रदान करने की भी) इस बात से परिलक्षित होती हैं कि कई बार यह बहस होती हैं कि बहस किस बात पर होनी चाहिए....

एक और बात जो बीते वर्ष सताती रही वो थी टिप्पणियों की बरसात की कामना...हम मन की कहने जग से निकले पर कब हाट पर नाचते बन्दर  की तरह तालियों के मोहताज हो गए पता ही नहीं चला. हर लेख लिखकर हमे लगा कि बस टिप्पणियाँ चेरापूंजी की बरसात के तरह शायद रुकेंगी ही नहीं किन्तु हालात तो सहारा की मरुभूमि से भी बदतर हो गए. किसी मेलोड्रामा से भरी पिक्चर के चोट खाए हीरो की तरह कभी-कभी हमे भी और चिठ्ठों पर टिप्पणियों के महासागर देखकर मंदिरों में जाकर घंटे बजा कर "बहुत खुश होगे तुम..." वाले डायलाग बोलकर ईश्वर से गिला-शिकवा करने का मन हुआ पर फिर लगा कि भगवान् से पंगा क्यों लेना,  किसी एकांत में गाना गाकर काम चला लेते हैं. फिर लगा कि चलो हम भी स्वान्तः सुखाय वाली श्रेणी में लिखने वाले बन जाते हैं.. (सच में कुछ दिनों तक डायरी में भी लिखना शुरू किया किन्तु मन न माना ) आखिर खट्टे अंगूरों के पकने और मीठा होने की उम्मीद तो हमेशा रहती हैं. बड़े बूढों ने कहा ही हैं कि उम्मीद पर दुनिया कायम है...

खैर, इसी कशमकश में हम जिन ज्ञानी-जनों ने हमे टिप्पणियाँ दी उनको भी आभार व्यक्त करना भूल गए... इस क्रम में कई वरिष्ठ चिठ्ठाकारों और सहयोगियों से एकलव्य की भांति सीखने की भी कोशिश की..आज इस अवसर पर उन सभी को ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ...उन सभी वरिष्टों का जिन्होंने टिप्पणियों से, त्रुटियों की ओर ध्यानाकर्षण से और आशीष देकर न केवल उत्साहवर्धन किया बल्कि मार्गदर्शन भी उन सभी को आज शत-शत नमन और उनसे इसी प्रकार मार्गदर्शन और स्नेहाकांक्षा की अपेक्षा है...यह आशा सिर्फ इसी चिठ्ठे के लिए नहीं वरन अन्य दोनों "जीवन के पदचिन्ह" (काव्य संग्रह) और सरयूपारीण (शोध )  के लिए भी है...और सभी प्रबुद्ध-जन जिन्होंने अपना आशीष बनाकर रखा है उनसे अनुरोध है कि आप  मेरी त्रुटियों को क्षमा करते हुए उचित मार्गदर्शन प्रदान करेंगे.

मुझे आजतक यह नहीं समझ में आया हम जन्मदिन क्यों उत्साहपूर्वक मानते हैं? इस विषम जगत में एक वर्ष सफलता पूर्वक जीने के लिए या मोक्ष प्राप्ति  के लिए एक वर्ष कम हो जाने के लिए...कौन जाने पर रुदन भरी इस दुनिया में रुदाली बनकर जिए तो क्या जिए - इसी फलसफे पर चलकर हम हर मौके पर ख़ुशी तलाश ही लेते...तो अपनी सालगिरह क्यों अपवाद हो....  और आने वाले समय को सिर्फ आशावादी दृष्टि से देखते हैं अतः आज  केवल आने वाले समय के लिए जहाँ व्यक्तिगत रूप से आशावान हूँ [इस वर्ष भारत-यात्रा और जल्द ही हिंदी संस्था भाषिणी  और एक व्यक्तिगत व्यवसाय  प्रारंभ करने का स्वप्न है जिसके चलते पिछले कुछ महीने चिठ्ठों में विराम था] वहीं अपने तीनो चिठ्ठों को लेकर भी आशा है कि ऐसे मनभावन पोस्ट लिख सकूँगा जिन्हें पाठक गण टिप्पणियों से भर देंगे. हमको मालुम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को खुश रखने को ग़ालिब यह ख्याल अच्छा है....

8 comments:

निर्मला कपिला said...

पहले तो जन्म दिन की बधाई। अक्तूबर के बाद आज इस ब्लाग पर लिखने आये हो और टिप्पणिया तलाश रहे हो आज कल लोग प[ालक झपकते ही तो आदमी को भूल जाते हैं हाँ तुम्हारी पोस्ट मे टिप्पणी वाला प्रा पढ कर कितनी देर अकेली हंसती रही हा हा हा डबल हैप्पी बर्थ डे पर इस पोस्ट के रूप मे तोहफा तो तुम ने दे दिया चलो फिर आशीर्वाद ही दे देती हूँ बहुत बहुत आशीर्वाद लम्बी आयू और सुख शाँति के लिये दुआ। ऐसे ही लिखते रहो मै तो हूँ न टिप्पनी देने के लिये। मुझे मेल कर दिया करो जब पोस्ट लिखो । कई बार मुझे पता नही चलता

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जन्म-दिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

sjpandey said...

ecellent attemptdear sudhir

संगीता पुरी said...

जन्‍मदिन की बहुत बहुत बधाई !!

Sudhir (सुधीर) said...

फेसबुक से मित्र अन्य और बहन निमिषा की टिप्पणियाँ

Nimisha Singh commented on your note "बोले तो...आज अपुन का डब&#2354...":

"nice thoughts Sudhir. jara ye socho jab Shruti tuhari zindagi mein aayi thi to tumne kitna utsaah aur kitni prasannta mehsoos hui thi...isiliye hum janmdin itne utsaah se manate hain ki humne apne wajood se apno ki duniya mein khushiyan bhar dee."


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Anay Das commented on your note "बोले तो...आज अपुन का डब&#2354...":

"pondy many wishes for the day."

Sudhir (सुधीर) said...

आप सभी आदरणीय प्रबुद्ध जनों की शुभकामनाएं एवं शुभेच्छा केलिए आभार...

sjpandey said...

jiwan ka shrestam mulyakan,outstanding attempts sjpandey

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ said...

क्या कहने साहब
जबाब नहीं
प्रसंशनीय प्रस्तुति
satguru-satykikhoj.blogspot.com

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