Saturday, August 22, 2009

इस छोटे से बालक से कौन डरेगा

अप्रवासी जीवन की सबसे बड़ी असमंजस भरी बात होती हैं कि "साम दाम दंड भेद" किसी भी जुगत से अपने बच्चों को अपने व्याप्त देसीपन की घुट्टी कैसे परोसी जाए। इसी ध्येय से प्रेरित होकर हम अक्सर ही बच्चों को कुछ न कुछ भारतीय परोसते रहते हैं.... फ़िर चाहे वो भारतीय किस्से हों या चलचित्र हो... अक्सर इस भारतीयता के उन्माद में हम यह भी भूल जाते हैं कि जो हम परोस रहें हैं वो बच्चे ग्रहण भी कर रहे हैं या वे अपनी ही समझ से कुछ और सीख रहे हैं....

हमारे एक मित्र हैं (नाम नहीं दे रहा हूँ क्योंकि मेरे मित्रगण जो इस चिठ्ठे को नियमित पढ़ते हैं उनको भी जानते हैं) जिनके दो पुत्र हैं दोनों में लगभग २ साल का अन्तंर हैं। कुछ सप्ताह पूर्व मैं उनके घर गया तो पाया कि दो बच्चों के बावजूद घर में जबरजस्त शान्ति हैं। इस अभूतपूर्व शान्ति से घर का सारा माहौल भी असहज सा लग रहा था। थोडी देर की औपचारिकता के पश्चात् मुझसे भी नहीं रहा गया, तो मैंने पूछ ही लिया की बच्चे इतने शांत क्यों हैं (इस प्रकार का परिवारिक मसलों का अतिक्रमण देसी भाई ही कर सकते हैं) । इस पर हमारे मित्र महोदय बोले - "यार! पूछो मत इन बच्चों ने नाक में दम कर रखा हैं। दोनों को 'टाइम आउट' दिया हैं। अब यहाँ बच्चों को अनुशासित करने के लिए मार तो सकते नहीं, तो टाइम आउट से काम चलाना पड़ता हैं" । मेरे अनुभव में अमेरिका में देसी बच्चों के लिए टाइम आउट ही सबसे ज्यादा प्रयुक्त सजा हैं जिसमे बच्चों को थोडी देर का एकांत दे दिया जाता हैं। किंतु यह सजा भी कुछ समय के बाद अपना असर खो देती हैं - हमारी बिटिया तो टाइम आउट मिलने पर ज्यादा खुश होती है ( -चलो कुछ क्षण डांट-डपट से पिंड तो छूटा) हमारे ज़माने तो बापू के थप्पड़ के डर से ही पता नही क्या-क्या हो जाता था ।

हमने भी आगंतुक की भूमिका निभाते हुए कहा - "क्या यार, इतने तो सीधे -साधे बच्चे हैं। इनको काहे को हड़का के रखा हैं। हुआ क्या?"। इस पर उन्होंने हमे बताना शुरू किया - "इन शैतानो को मैं दिखाने के लिए "बाल-गणेशा" की सीडी लाया था।" हमारे मन ने उसी क्षण एक जोर का झटका धीरे से खाया - भइया इ आधुनिकता की मिसाल कौनो न कौनो रूप में सामने आ ही जाती हैं - योग का योगा, गणेश का गणेशा!! अरे भइया भगवान् का नाम तो नहीं बिगाडो!! पर मन को हमने भी औपचारिकता के आँचल में ढककर मौन का सहारा लिया। उन्होंने अपना कथन जरी रखा - "मैंने सोचा भक्ति भावः से भरी पिक्चर हैं..कार्टून के साथ...कम से कम दोनों कुछ तो जानेगे अपने देवी-देवताओं के बारे में, अपने कल्चर के बारे में....कुछ समझ तो बनेगी हमारी पौराणिक कहानियों की.....इन दोनों ने भी बड़ा मन लगाकर कर पुरी पिक्चर देखी!!" मैंने हामी भरकर उन्हें आश्वस्त किया कि मैं इस कथांकन में अभी भी उनके साथ हूँ। उन्होंने कहानी को आगे विस्तार दिया..."भइया हमने सोचा था कि पिक्चर देखकर कुछ गणेशा के बारे में सीखेंगे पर ई दोनों असुरों से सीख लिए..." उनकी आंखों और वाणी में क्रोध और वेदना के मिले जुले भावः स्पष्ट उभर आए। हमारे ह्रदय में भी इस रहस्य और उसके आसुरी पक्ष को जानने की उत्कंठा भी तीव्र हो गई। हमने फिर निशब्द हामी भरी और उन्होंने आगे कहा - "पिक्चर देखने के बाद , शाम को यह दोनों सब-डिविजन (मुहल्ले) के बाकी बच्चों के साथ खेलने लगे ...तुमको तो पता हैं छोटा वाला बड़े वाले का चेला हैं...सो सारे बड़े वाले के दोस्तों ने मिलकर खेल-खेल में बाल-गणेशा का मंचन शुरू कर दिया । छोटा वाला गणेशा बना और बाकी सभी राक्षस... पिक्चर के एक सीन में बाल-गणेशा सारे राक्षसों को ललकारता हैं। उसपर सारे राक्षस बाल गणेशा को यह कह कर नकार देते हैं - "इस छोटे से बालक से कौन डरेगा" किंतु राक्षसों को गणेशा को हल्के लेना काफी भारी पड़ता हैं और गणेश उन सभी का काम-तमाम कर देता हैं। हमारे बड़े साहबजादे ने भी अपने दोस्तों के साथ राक्षस दल का नेतृत्व किया लेकिन हराने के लिए तैयार नहीं थे...इनके सारे दोस्तों ने मिलकर कर छोटे वाले को इतना पीट दिया कि उसका हाथ ही टूट गया...चेहरा भी सूज गया हैं - अब बताओ इन दुष्टों को सजा न दूँ तो क्या करुँ?"

उनकी कहानी सुनकर हमसे उनसे उस वक्त कुछ भी कहते न बना । थोडी देर बाद जब हम उनके घर से निकले तो बस यही सोचते हुए कि आजकल के बच्चे - बाप से बाप !!

4 comments:

Mithilesh dubey said...

जहाँ तक मेरा विचार है आज की फिल्मे हमारे बच्चो पे विपरीत असर डाल रही हैं । बच्चे ऐसी ही फिल्मे देखकर हिंसक हो रहे है जो की गम्भीर समस्या है, इन सबके के बीच बचपन खत्म होता जा रहा है।

संजय तिवारी ’संजू’ said...

प्रभावी लेखन.

AlbelaKhatri.com said...

धीरज जी,

किस पुरानी सोच में आप हैं

ये बच्चे ...

बच्चे नहीं हैं

आने वाली पीढियों के बाप हैं

Vivek Rastogi said...

हम भी हमारी औलाद की हरकतों से परेशान हैं, कई बार उनकी शरारतों से मजा आता है पर कई बार परेशानी खड़ी हो जाती है।

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