Friday, February 20, 2009

बेवफाई मेरी आदत नहीं, मजबूरी हैं!!

हम बेवफा हरगिज़ न थे, पर हम वफ़ा कर न सके
हमको मिली उसकी सज़ा, हम जो खता कर ना सके
हम बेवफा हरगिज़ न थे, पर हम वफ़ा कर न सके

फ़िल्म शालीमार का यह प्रसिद्ध किशोर दा का गीत किसे याद न होगा। कुछ दिनों पूर्व दैनिक जागरण का एक लेख पढ़ रहा था कि "क्यों सोचते हैं स्त्री पुरुष अलग-अलग"। लेख पढ़कर मन ने इस गीत को गुनगुनाना शुरू कर दिया। इस लेख में तमाम कारणों में से जो मुझे सबसे विशिष्ट लगा था - वैज्ञानिक शोधों से यह साबित हुआ है पुरुषों के न्यूरोकेमिकल्स ही बताते हैं कि वे वफा करेंगे, निभाएंगे या बेवफा होंगे। अर्थात उनकी एक जीन (पित्रैक) तय करती है कि वो वफ़ा करेंगे या बेवफाई। यह जीन (पित्रक) जो १७ विभिन्न आकारों की होती है - अपनी लम्बाई के आधार पर तय करती हैं कि कौन -कितना भरोसेमंद और वफादार होगा। जितनी लम्बी जीन उतना वफादार साथी। अतः बेवफाई पुरुषों की आदत या फितरत नहीं वरन उन्हें अनुवांशिक रूप से मिली विरासत हैं -जिसे हम चाहकर भी नहीं छोड़ सकते।

शाम आते आते मन में हलचल सी चलने लगी। अभी तक तो केवल विवाह पूर्व ही कुंडली के स्थान पर लोग रक्त समूह (ब्लड ग्रुप) के मेल कि बात करते थे। अब आने वाले समय तो पुरुषों के लिए और गंभीर चुनौतीपूर्ण होने वाला हैं। लड़कियां दोस्ती से पहले अनुवांशिक विवरण मांगेगी यह तय करने के लिए कि यह साथी उपयुक्त हैं कि नहीं।

जैसा कि आधे से अधिक संगणकीय छात्रों के साथ होता हैं - हम भी विषय विश्लेषण के लिए गूगल बाबा की शरण में गए और झट से वैश्विक ज्ञान के सागर में गोते लगाने लगे। और पूछिये मत कौन कौन सी जीन का कौन सी पुरुषीय प्रणाली कि संचलित करती मिली। मन और भी अधिक व्यग्र हो गया। कोई तलाक तय करती हैं तो कोई रिश्तों कि संतुष्टता और कोई प्यार की उन्मादकता। (कई तो सामाजिक लेख में लिखी भी नहीं जा सकती )। ऐसा लगा कि बिचारे पुरूष तो कुछ करते ही नहीं, जो भी करते हैं यह शरारती पित्रक ही करते हैं।

जहाँ पहले लेख को पढ़कर हमे सोचा था कि चल आज सारी पुरूष जाति को बेवफाई के इल्जाम से मुक्त कर देंगे और सब कुछ इन पित्रको (जीन) के माथे मढ़ देंगे। पर अब सोचते हैं कि पित्रकों पर इल्जाम से तो हमे सारे के सारे पुरुषों को सगोत्र (खानदान सहित) इल्जामित कर दिया हैं। पर चलो, इसका मतलब यह भी हैं कि सम्पूर्ण गलती आदम जी से ही चली आ रहीं, हम लोग तो केवल वाहक मात्र हैं।

व्यग्र,
अप्रवासी

3 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

हम बेवफा हरगिज़ न थे, पर हम वफ़ा कर न सके
हमको मिली उसकी सज़ा, हम जो खता कर ना सके
हम बेवफा हरगिज़ न थे, पर हम वफ़ा कर न सके
इन पंक्तिओं से अच्छा सिलसिला
chhed दिया ...अच्छी post के लिए बधाई

विनय said...

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mizah güncel said...

http://mizahguncel.blogspot.com/

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