Thursday, February 5, 2009

अभिनन्दन के वैश्विक तरीके और अप्रवासी जीवन

अब जब ब्लॉग (चिठ्ठा) लिखना शुरू करही दिया हैं तो हमने सोचा कि चलो देखे दीन-दुनिया में लोग क्या लिख रहे हैं। अपने इसी बंजारेपन में भटकते हुए हम ममता जी के एक लेख से टकराए। ममता जी उत्तर प्रदेश से निकल कर गोआ के सामाजिक परिवेश में रचने बसने के लिए प्रयासरत हैं। उनके इस बदले हुए परिवेश में अभिनन्दन की प्रथाएं भी भिन्न हैं। उन्होंने अपने लेख "mamta t .v.: कभी-कभी ऐसे हालात हो जाते है कि बस (.shake hand और cheek kissing)" में एक ऐसा पहलू उठाया हैं जोकि हमारे अप्रवासी माहौल में भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने करबद्ध नमस्ते के स्थान पर गालों के स्पर्श और चुम्बन से अभिनन्दन करने की वजह से होने वाली असहजता का वर्णन किया हैं।

अपने अप्रवासी जीवन के शुरूआती दौर में (तत्पश्चात विवाहोपरांत भी)मैंने स्वं इस असहजता को अनुभव किया हैं। भारत छोड़ने के पश्चात भी अपनी रग रग में बसे देशीपन को हम कभी नहीं छोड़ पाते हैं। अपनी तो अपनी हम अपने पाले हुए इस देशीपन को अपने संतानों में भी देखना चाहते हैं (सबके लिए तो नहीं कह सकता पर स्वं के लिए यह शतप्रतिशत सत्य हैं)। परन्तु पता नहीं की हमारी अगली पीढी हमारे देशीपन और मानसिकता का कितना आदर करती हैं और क्या रूप लेती हैं... इस बात अभी तो कुछ समय हैं। हमारे इस अप्रवासी जीवन में यह चिंता तो हमेशा ही रहेगी पर फिर सोचता हूँ कि पता नहीं जिस प्रकार भारत में भी नयी पीढी करवट ले रही हैं शायद हमारी अगली पीढी यहीं अधिक सुरक्षित हैं। गोआ का अभिनन्दन (जिससे ममता जी असहज हैं) को हमने २००६ में अपने लखनऊ में पसरते हुए देखा हैं



खैर, काल की थाप को कौन समझ पाया हैं? जो होगा, जब होगा तब देखा जाएगा ...



विचारमग्न,

अप्रवासी

7 comments:

अजित वडनेरकर said...

ब्लाग जगत में आपका स्वागत है।

लाल और बवाल (जुगलबन्दी) said...

हिन्दी को अंतरजाल पर समृद्ध करने के लिए आपका यह प्रयास अति सराहनीय है. आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं.

Abhishek said...

Chinta vajib hai aapki. Swagat.

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

रचना गौड़ ’भारती’ said...

भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लि‌ए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

Pankaj said...

सुधीर तुम्हरी चिन्ता सही है | वन्श अन्न्तराल का अस्ली माय्ना हमारी पीदी अब समझ रही है | इस तरह कि दुविधाओ का सामाधन शायद घर के अच्छे वातावरन से हो सक्ता है | अप्ने माता पिता की तरह लगातार कोशिश कर्ना हामारा फर्र्झ ओर कर्तव्य है ... कुछ भी "अन्क्ल सैम" पर मत छोद देना !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

काल बहुत बलवान है - उससे हमारा कोई विरोध नहीं है.

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